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Tuesday, 22 May 2012

चलिए चलकर गाँव में देखें




गाँव में क्या है शहर से बढ़ कर, चलिए चलकर गाँव में देखें
पनघट और चौपाल का मंज़र, चलिए चलकर गाँव में देखें

गोरी, घटाएँ, घूंघट, गागर, चलिए चलकर गाँव में देखें
शर्त है लेकिन ख़ूब संभल कर, चलिए चलकर गाँव में देखें

सादा जीवन, सच्चे सुख-दुख, गर्म ऑंसू, ठण्डी मुस्कानें
उमड़ा हुआ प्यार का सागर, चलिए चलकर गाँव में देखें

भूली-बिसरी तहज़ीबों के धुंधले-धुंधले नक्श-ओ-निगार
क्या-क्या है पुरखों की धरोहर, चलिए चलकर गाँव में देखें

शहरों में तो चढ़ जाता है पीतल पर सोने का पानी
कंगन, झुमके, पायल, झूमर, चलिए चलकर गाँव में देखें

सूरज रोज़ सवेरे उठकर करता है तैयार जिसे ख़ुद
तारों जड़ी वो चांद की चूनर, चलिए चलकर गाँव में देखें

हिन्दू-मुस्लिम मिल के मनाएँ, होली हो या ईद का मिलन
त्योहारों का रूप उजागर, चलिए चलकर गाँव में देखें

भेद-भाव से नाता तोड़ें लेकिन पक्के शेख़-ओ-बिरहमन
दोनों मिलेंगे एक डगर पर, चलिए चलकर गाँव में देखें

ऊँचे मकानों में न मिलेंगे, पीपल-बरगद-नीम के साए
चौखट-चौखट धूप के तेवर, चलिए चलकर गाँव में देखें

बच्चे-बूढ़े, नर और नारी, सब ही मिलें उल्लास से भरे
धरती की पूजा के अवसर, चलिए चलकर गाँव में देखें

बच्चे हमें देखें जो अचानक, मारे ख़ुशी के ताली बजाएँ
फेंक के साकित झील में कंकर, चलिए चलकर गाँव में देखें

दुनिया भर की सारी झीलें, ‘नूर’ निछावर हों सब जिस पर
ममता का वह मानसरोवर, चलिए चलकर गाँव में देखें

-कृष्ण बिहारी ‘नूर’